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Police Animals - Meghdoot horse of Madhya Pardesh Police - Naresh Kadyan

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India

Police Animals - Meghdoot horse of Madhya Pardesh Police - Naresh Kadyan Reviews

OIPA in India rep. Naresh Kadyan May 5, 2011
Meghdoot Police horse be Retired and rehabilited with respect not auctioned - Abhishek Kadyan
Matter taken up with MP, Police by OIPA in India vide code JUOPXPSD
OIPA in India demands legislation for Police animals in India and retired animals be given respect, treatment, care and shelter not to auctioned for slaughter - Naresh Kadyan.

भोपाल. दंगे हो या पुलिस वालों पर पथराव, या फिर किसी नेता की सुरक्षा का मामला, हर समय कानून व्यवस्था संभालने में मुस्तैदी से मदद करने वाले मेघदूत को राहत मिल गई है। पीपुल्स फॉर एनिमल्स की राष्ट्रीय अध्यक्ष मेनका गांधी के हस्तक्षेप के बाद पुलिस मुख्यालय ने फिलहाल मेघदूत को बेचने का निर्णय टाल दिया है।

हम बात कर रहे है पुलिस महकमे से रिटायर हुए घोड़े की, जिसे नीलाम करने का फैसला लिया गया था।

रुस्तमजी आयुध व पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज इंदौर ने मेघदूत को ट्रेंड करके 1992 में सातवीं वाहिनी बटालियन को सौंपा था। उस समय उसकी उम्र चार वर्ष थी। बूढ़े व लंगड़े होने पर पीएचक्यू द्वारा गठित समिति ने उसे मार्च 2011 में अयोग्य घोषित कर दिया। इसके बाद 31 मार्च को विभाग ने नीलामी का टेंडर निकाला।

पीपुल्स फॉर एनिमल की स्थानीय कार्यकर्ता सोनाली दात्रे ने इसकी सूचना संस्था की राष्ट्रीय अध्यक्ष मेनका गांधी को दी। श्रीमती गांधी ने इस संबंध में राज्य के डीजीपी एस के राउत से फोन पर बात कर इस नीलामी का विरोध किया। इसके बाद पीएचक्यू ने छह अप्रैल को नीलामी स्थगित करने के निर्देश जारी कर दिए।

अयोग्य घोषित करने का निर्णय लेती है कमेटी पुलिस प्रशासन इसके लिए कमेटी गठित करता है। इस कमेटी में पशु चिकित्सक, सेनानी अध्यक्ष, सहायक सेनानी, शाखा कंपनी कमांडेंट या प्लाटून कमांडर व मुख्य लिपिक शामिल होता है।

घोड़े का पूरा परीक्षण करने के बाद उसकी शारीरिक स्थिति पर विचार किया जाता है। उसके बाद समिति निर्णय लेती है कि वह घोड़ा काम का है या नहीं। उसके बाद ही नीलामी की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसके पहले बाजीराव और कपिल नाम घोड़े को अयोग्य घोषित किया गया था लेकिन इनको मिले पुरस्कारों को देखते हुए विभाग ने उनकी आजीवन देखभाल की थी।

पुलिस महकमे की बटालियन में घोड़े-116 प्रतिदिन खर्च 2-3 हजार रु.

बूढ़ा हो गया है

बूढ़ा हो चुका मेघदूत अब पुलिस के लिए मुसीबत का कारण बन चुका है। प्रशासन यह नहीं समझ पा रहा कि वे मेनका गांधी की बात माने या फिर ऑडिट विभाग की। मेनका गांधी का कहना है कि जिस घोड़े ने सालों मुस्तैदी से काम करके कानून व्यवस्था को संभाला है, उसे सेवानिवृत्ति के बाद सम्मानपूर्वक जीने का हक है, न कि किसी तांगे में जोतकर बोझा ढोने या यातना सहने के लिए बेच देना।

इधर पुलिस प्रशासन का कहना है कि एक बार अयोग्य घोषित किए जाने पर उसके खाने के खर्च पर ऑडिट वाले आपत्ति उठाते हैं। उनका मानना होता है कि अयोग्य घोड़े पर जो व्यय कि जा रहा है, वो अपव्यय की श्रेणी में आता है।

ऐसे में बटालियन में काम कर रहे कर्मचारियों के वेतन से उसका खर्च काटने के निर्देश तक दिए जाते हैं। ऐसी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए सातवीं वाहिनी बटालियन ने मुख्यालय को पत्र लिखकर पूछा है कि उसका खाना खर्चा किस मद में डाला जाए।

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